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खनिज विभाग को घाटा

मौरम खदान संचालकों के घर आ रही धनलक्ष्मी लेकिन सरकार को घाटा, खनिज राजस्व में लगातार नुकसान

"बुंदेलखंड के बाँदा में बालू ठेकेदारों के घर आई धन लक्ष्मी और खनिज विभाग हुआ कंगाल यह पंक्ति इसलिए चरितार्थ हैं क्योंकि राजस्व वसूली में विभाग को 1.08 अरब रुपये का घाटा है। बाँदा में खबर अनुसार 97 करोड़ रुपये खनिज राजस्व में कमी हुई है। बाहरी खनन कम्पनियों से लगातार खनिज राजस्व को चूना लग रहा है। पांच साल के मौरम पट्टेधारक एक सीजन में खदान खोखला कर दिए हैं। हालत यह हैं कि अब चली हुई खदानों को 6 माह के लिए फिर टेंडर किया जा रहे ताकि राजस्व की भरपाई हो सके लेकिन ठेकेदार खदानों की पतली सूरत देखकर बैकफुट पर है। गाहे बगाहे सीज खदान से बन्द ओटीपी के बावजूद क्षेत्रीय प्रशासन को साधकर अवैध खनन होता है। दो साल से खदानें चलने के साथ मार्च से ही मौरम डंपिंग का खेल शुरू हो गया है। दिन में पहाड़ जैसा मौरम डंप रात्रिचर माफियाओं व ट्रक परिवहन से खाली करते हैं और नदी से रातभर में पुनः भर देते हैं। डंप में रॉयल्टी कहीं और की और बालू कहीं और की यह सुविधा भी बाँदा में सुलभ है।" 


बुंदेलखंड के बाँदा में लाल मौरम- बालू का धंधा करना अब घाटे का सौदा साबित होने लगा है। खदान पट्टेधारक / ठेकेदार अपनी लागत निकालने के लिए स्थानीय दबंगों को मौखिक खदान बेच देता हैं। अब स्थानीय चलतु आदमी सिस्टम को मैनेज कर हैवी पोकलैंड, जेसीबी और चोरी छिपे लिफ्टर से खनन करता है। अवैध खनन भी ऐसा किया जा रहा है कि नदी कैचमेंट एरिया और डूब क्षेत्र व ग्राम समाज की लाल मौरम तक बिचौलियों के माध्यम से निकासी होती है। बाँदा में खनिज एक्ट 1963 की उपधारा 41 ज,पर्यावरण सहमति प्रमाणपत्र और जल/ वायु सहमति प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एनओसी सहित खनिज लीज की शर्तों को रौंदकर ठेकेदार बालू खदान का संचालन करता हैं। हाल यह है कि पट्टाधारक वैध-अवैध तरीक़े से रकम निकालने की जुगत में भारीभरकम प्रतिबंधित मशीनों को केन,बाघे,यमुना,बेतवा ( केन की सहायक नदियां) में उतार देता हैं। नदी की जलधारा में अस्थाई अवैध पुल बनते हैं और खनन का रामराज्य बेखौफ शुरू हो जाता है। किसी किसान या सामाजिक कार्यकर्ता ने शिकायत की तो पहले समझाया जाता है। मानता हैं तो ठीक नहीं तो फर्जी मुकदमे और यदि बात नहीं बनी तो फौरी कार्यवाही कर उसको शांत करने की जद्दोजहद होती है। नदी क्षेत्र के किसानों को व्यवस्थित तरीक़े से समझौता में लेकर उनके खेतों से नदी स्थल तक मशीनों की आवाजाही को रस्ता लिया जाता है। अर्थात धरतीपुत्र किसान भी परोक्ष रूप से अवैध खनन का हिस्सेदार है। अक्सर प्रशासन की टीम छापेमारी करती हैं, पोकलैंड चौकी को सुपुर्द होती है लेकिन दो दिन बाद फिर वही ढर्रा आबाद हो जाता है। मिली जानकारी मुताबिक खदानों की माली हैसियत बढ़ी है। ठेकेदार रुपया काट रहें हैं लेकिन खनिज विभाग लगातार घाटे में जा रहा है। इसका बड़ा कारण अवैध खनन के लिए पनप चुका सिंडिकेट, सिस्टम की घूसखोरी और मीडिया प्रबंधन का खेल हैं। यह बन्द हो जाये तो राजस्व में लगने वाला घाटा पूरा हो सकता है। अब लोग चाहे जेब में रुपया भर ले और चाहे सरकार के खजाने में। अलबत्ता सिस्टम ही फलता-फूलता हैं। आंकड़ों के अनुसार बीते वर्ष 2021 में बालू रॉयल्टी से 2 अरब 88 करोड़ 62 लाख 70 हजार 553 रुपया राजस्व मिला था। इस वर्ष यह घटकर एक अरब 80 करोड़ 40 लाख 59 हजार 650 रुपया रह गया है। उधर तहबाजारी ठेकेदारी भी घाटे में लेकिन इसका ठेका टेंडर कीमत में हर साल बढ़ इजाफा कर रहा है। इसमें भी हर तरह का मैनेजमेंट करना है मसलन 200 की रसीद पर 300 रुपया लेना है तो सबको समझना पड़ता है। बेचारा तहबाजारी वाला और खदान संचालक कुछ न चाहते हुए भी अवैध खनन, ओवरलोडिंग को प्रश्रय देते हैं। खनिज विभाग को अवैध खनन जुर्माना, अन्य मद में भी घाटा लग रहा है। पिछले साल मार्च तक 2 अरब 96 करोड़ 72 लाख 23 हजार 301 रुपया आया था। वहीं इस वर्ष यह घटकर एक अरब 99 करोड़ 72 लाख 9 हजार 942 रुपया है। अर्थात 97 करोड़ का घाटा लग रहा है। जाहिर है सिस्टम का प्रबंधन ज्यादा रुपया हजम करने लगा है और सरकार का राजस्व घटने की तरफ अग्रसर है। खनिज विभाग का वार्षिक लक्ष्य 4 अरब रुपया है जो अभी 50 फीसदी पूरा हुआ है। शासन के निर्देश हैं खनिज राजस्व में वृद्धि होनी चाहिए लेकिन कैसे जब अवैध खनन चरम पर है और रिश्वतखोरी शीर्ष पर विराजमान है। 

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खदान खोखली तो तोड़ दिया पुल-


बाँदा के पैलानी क्षेत्र की खपटिहा कला खदान 100/3 में बना अस्थाई पुल तीसरी बार तोड़ा गया है। खदान संचालक का हौसला इतना जबर है कि सिस्टम हार जाता है। खदान की ओटीपी बन्द लेकिन अवैध खनन चल रहा है। माफियाओं पर चलने वाला बुलडोजर बाँदा में केन नदी की जलधारा पर चलता है। बोल्डर व लोहे की मजबूत प्लेट से अवैध पुल बनते हैं फिर टूटते हैं। उल्लेखनीय हैं बुंदेलखंड में अपना राजनीतिक अस्तित्व मजबूत किये दो जलशक्ति मंत्री यहीं से है। क्रमशः जलशक्ति राज्यमंत्री रामकेष निषाद बाँदा से व कैबिनेट मंत्री / जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ज़िला जालौन से आते हैं लेकिन केन व दूसरी नदियों की दुर्दिनता यहां बदलने का नाम नही ले रही है। ज्यादातर सिंचाई परियोजना इन्ही मृत होती नदियों पर आश्रित हैं तब उनका भविष्य क्या होगा यह बड़ा सवाल है। उधर ग्राम मरौली खंड 2 में भी नदी जलधारा पर अस्थाई पुल अभी तक टूटा नहीं है। सवाल यह कि यदि पोकलैंड से खनन वैध है तब प्रशासन के खदान पहुंचते ही यह खेतों में क्यों छुपा दी जाती है ? समाधान यह है कि सीसीटीवी कैमरों का कंट्रोल रूम लखनऊ में स्थापित हो और वहीं से निरंतर निगरानी की जाए तब यह अवैध खनन व ओवरलोडिंग रुक सकता है। बांकी सब ठीक ही है....

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